हनूज दिल्ली दूरअस्त- दिल्ली अभी दूर है मेरी जान.....
'नशा बन्द करवादो बस और कुछ नहीं चाहिए' लगभग 70 साल की वृद्ध महिला की पीछे खड़ी भीड़ में से आवाज़ आयी। आंखों में आंसू लिए अपने बेटे के बारे में कहती हैं 'पति नहीं है...दो लड़के हैं, नशा करते हैं। काम धाम करते नहीं हैं उसकी बहु और बच्चे भी मेरे ही सर है।' इस बैठकर आराम से खाने की उम्र में वो 70 साल की वृद्ध फलों का ठेला लगाती हैं। अपना घर चलाती हैं। जो पैसा मिलता है उसको बेटा नशे में उड़ा देता है।
बवाना स्थित जे जे कॉलोनी।
मेट्रोपोलिटन सिटी की चकाचौंध से दूर दिल्ली का ये इलाका है जे जे कॉलोनी। बवाना विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। बवाना जेजे कॉलोनी, एक रिसेटलमेंट कॉलोनी है, 2004-05 में अस्तित्व में आई थी। इस कॉलोनी में लगभग 65300 लोगों की आबादी रहती है। जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली निगम द्वारा चिह्नित किया गया क्षेत्र है, जिसे शहर से हटाए गए झुग्गीवासियों के पुनर्वास के लिए रखा गया है। कॉलोनी से सटी हुई ही बवाना नहर है जिससे लगती हुई सारी झुग्गियां हैं, बस्तियां हैं।
लोग इन्ही झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। ताज्जुब होगा जानकर कि गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, स्वच्छता, चोरी और घरेलू हिंसा से इतर यहां की मुख्य समस्याएं शराब, नशाखोरी है।
बस स्टैंड, यहां मुश्किल ही बस आती हैं।
यहां मेट्रो नहीं पहुंची है। बस अड्डे और स्टेशन तक जाने में ही 500-600 रुपया ऑटो में लग जाता है। एक बस स्टैंड है जिसपर 5-6 लोग बैठे हैं .. सामने डीटीसी की ग्रीन वाली बस खड़ी है। लेकिन एकदम खाली.... बस खड़ी होने भर की ही लग रही है। बारिश होने पर पानी घुटनों तक भर जाता है। हालांकि सड़क बनी है लेकिन काम चलाऊ। चुनाव है इसलिए शायद सब चकमक कर दिया गया है। राजनीतिक प्रक्रिया का खैर निष्क्रिय है ही, लकवाग्रस्त है।
तमाम गन्दगी के बीच बसे घर।
ऐसे ही दूसरी महिला बताती है कि ,'मेरा भाई, बेटा, चाचा सब खराब हो गए नशे के चक्कर में। यहां बस नशा बन्द करवादो।' इसी 'नशे बन्द' करवाने वाली बात को बार बार कहना उनको जरूरी लग रहा था। क्योंकि यही उनका मुद्दा है, यही उनकी समस्या है। इस क्षेत्र में हर साल नशे के कारण कई मौतें होती हैं। जिसमें बच्चे, बूढ़े, युवा सब आते हैं। पुलिस भी आमजन की बात नहीं सुनती। केस को रफा-दफा करने की पुरानी आदत है। एक महिला कहती है कि 'ऊपर से आर्डर है इन्हें नशा करवाने के नहीं तो अभी तक सरकार ने बन्द क्यों नहीं करवाया'।
जे जे कॉलोनी स्थित स्कूल।
नशा एक बड़ी समस्या है। खुलेआम नशे के समान का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट एक घर से दूसरे घर हो रहा है। अब ये बात प्रशासन को पता है या नहीं मैं नहीं जानती। लेकिन क्षेत्रिय निवासियों के अनुसार तो यहां कभी शांति नहीं रही। खुल्लेआम सब बिकता है।
मैं नहीं जानती कि रिठाला से बवाना तक बड़ी बड़ी गाड़ियों में बैठकर जाते हुए मंत्रियों, विधायकों, नेताओं के लिए वो इलाका कितनी दूर है लेकिन इतना दावे के साथ कह सकती हूँ कि यहां के लोगों के लिए तो हनूज दिल्ली दूरअस्त...
अपनी दिल्ली चुनावी यात्रा में हम पहुँचे दिल्ली के पहले आदर्श गांव में...
दिल्ली-हरियाणा के बॉर्डर से सटा ये गांव है भाटी खुर्द, भाटी माइंस। साउथ दिल्ली के मेन छतरपुर रोड के अंतिम कोने पर स्थित ये दिल्ली का पहला आदर्श गांव है। दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर स्थित इस गांव के दाहिनी तरफ असोला गांव और बाईं ओर डेरा मांडी गांव हैं। ये छतरपुर मेट्रो स्टेशन से लगभग 40 मिनट के रस्ते पर है।
गांव की शुरुआत कुछ ऐसे नज़ारों से।
2014 में पीएम नरेंद्र मोदी की सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत भाटी माइंस दिल्ली का पहला मॉडल गांव बना। साउथ दिल्ली से बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने इस गांव को गोद लिया था। गांधी जी के सपनों के आधार पर इस गांव को मॉडल गांव बनाया जाएगा ऐसा कहा जा रहा था।
भाटी माइंस को मॉडल गांव के रूप में विकसित करने के लिए दिल्ली बड़ी बड़ी टीमों द्वारा स्टडी करवाई गयी थी, तमाम सर्वे करवाये गए थे, ताकि यहां रहने वाले लोगों को हर तरह की जरूरी सुविधाएं मिल सकें।
मूलभूत सुविधाओं से वंचित है यह गांव।
सांसद रमेश बिधूड़ी के गोद लिए इस 'आदर्श' गांव में इलाज के लिए आज तक भी कोई डिस्पेंसरी नहीं है। अस्पताल गांव से लग 5-6 किलोमीटर की दूरी पर है। पढ़ने के लिए बच्चे आज भी गांव से दूर वाले स्कूलों में जाते हैं।
यहां ज्यादातर लोग बाहर के राज्यों से आकर बसे हैं। श्यामकली नाम की एक ग्रामीण महिला बताती हैं कि 'इस गांव में आधे से ज्यादा लोग किरायेदार हैं'। गांव की शुरुआत में ही घरों की टूट फुट हुई है। ये वही टूटे हुए घर हैं जिन्हें सरकार की ज़मीन कह कर तोड़ा गया है।
भाटी गांव की श्यामकली आंटी।
इस क्षेत्र को 1976 (छियत्तर) में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी द्वारा बसाया गया था। वहीं से इसका नाम संजय कॉलोनी पड़ा। तब यहां लगभग 200 घर बने थे। पहले ये केवल एक गांव था। यहां के लोग गांव सभा के मतदाता थे। फिर 1991(इक्यानवे) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर एक नोटिस जारी कर इसे रिज़र्व्ड फॉरेस्ट एक्ट के तहत वन विभाग के अधीन कर दिया गया।