Wednesday, April 29, 2020

तुमको याद रखेंगे गुरु हम.....भगवान कसम


इरफान खान। (स्त्रोत: गूगल)

दरिया भी मैं, दरख़्त भी मैं
झेलम भी मैं, चिनार भी मैं
दैर भी हूँ, हरम भी हूँ
शिया भी हूँ, सुन्नी भी हूँ
मैं हूँ पंडित, मैं इरफान हूँ
मैं था, मैं हूँ और मैं ही रहूंगा। 
इरफान खान का जाना सिनेमा जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। सचमुच 'जाना' हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है। इरफान 80 के दशक के बाद से ही धारावाहिकों में दिखना शुरू हो गए थे। इरफान के करियर की शुरुआत टेलीविजन सीरीज से हुई...शुरुआती दिनों में चाणक्य, भारत एक खोज, चंद्रकांता में दिखे। वहीं फिल्मी करियर की शुरुआत सलाम बॉम्बे में एक छोटे से रोल से हुई थी। उन्होंनेे 'मकबूल', 'रोग', 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'स्लमडॉग मिल्लीनेयर', 'पान सिंह तोमर', 'दा लंचबॉक्स, 'पीकू' से लेकर 'अंग्रेज़ी मीडियम' तक का सफर तय किया।

1993 में, इरफान ने ज़ी टीवी की 'बनेगी अपनी बात' में अभिनय किया। यह एक कॉलेज-लाइफ बेस्ड सीरीज थी। इरफ़ान के साथ-साथ इसमें अभिनय कर रहे अन्य अभिनेताओं को भी इस सीरीज़ ने बेहद लोकप्रिय बनाया था। इरफान खान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के स्टूडेंट रहे। और वहां से पास होने के बाद ही उन्होंने अभिनय की शुरुआत की।

2003 में आयी फिल्म  हासिल से इरफान को अभिनेता के रूप में पहचान मिलने लगी। ये वो दौर था जब वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ही रहे थे। इसमें इरफान ने छात्र नेता रणविजय सिंह का किरदार निभाया था। 'हासिल' का डायलॉग "और जान से मार देना बेटा, हम रह गये ना, मारने में देर नहीं लगायेंगे,भगवान कसम" लोगों की जुबान पर आज तक है। हासिल ने हिंदी फिल्मों को एकबार फिर छात्र और जाति की राजनीति याद दिलाई जिसे कहीं न कहीं फिल्मी दुनिया 70 के दशक में ही पीछे छोड़ चुकी थी।

बॉलीवुड हो चाहे हॉलीवुड हर जगह उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। हॉलीवुड की 'द अमेजिंग स्पाइडरमैन' (2012) में इरफान ने एक विलेन का रोल किया था। एक इंटरव्यू में वह कहते हैं कि, 'मेरे पास बच्चों को दिखाने के लिए कुछ नहीं था, ये फ़िल्म मैने बच्चों के लिए बनाई है'। इसके बाद आयी और फ़िल्में फिर चाहे वह 2007 में आयी एंजेलिना जोली की 'ए माइटी हार्ट' हो, 2015 में आयी 'जुरैसिक पार्क' हो या फिर 'द नेमसेक' हो इरफान ने अपने फैंस के दिलों को जीतने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि 2012 में आयी 'द लंचबॉक्स' ने इरफान को प्रसिद्धि के चरम पर पहुंचा दिया था।
अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण के साथ 'पीकू' (2015) में इरफान हीरो ना होते हुए भी हीरो लग रहे थे। एक अजीब से अनरोमांटिक सच्चे प्रेमी के रूप में हमेशा की तरह फ़िल्म को बेहतर बनाने में अपनी भागीदारी निभाई।

और? और..
इरफान खान की फिल्मों के पोस्टर।
यार.....ये सब न बस यूँही था..ये सब फॉरमैलिटी वाली बातें थी..असल में तो ये लिखना था कि ......
'मेरे कुछ सपने थे, कुछ प्लान्स थे, कुछ महत्वकांक्षाएं थी और मैं पूरा उसमे खोया हुआ था। अचानक किसी ने मेरे कंधे पर थपकी दी। मैंने पलटकर देखा तो टीटी था। तेज़ी से बदलती चीजों ने मुझे अहसास दिलाया कि कभी भी कुछ भी हो सकता है"।
अपनी आखिरी चिट्ठी में यही कहा था ना तुमने?

तुम चोर, चरसी, पुलिस वाला, सड़कछाप गुंडा, नवाब, डकैत, आतंकवादी, हत्यारा, गैंगस्टर से लेकर एक घनघोर एवरेज प्रेमी, एक मंगेतर, एक पति तक सब किरदार निभा गए। तुम्हारी किसी फ़िल्म में तुम किसी आइडियल रोल में नहीं रहे। तुम्हारा कोई रोल 'आइडियल' नहीं रहा। तुम हर फ़िल्म में एकदम सादे दिखाई दिए। एकदम सिंपल। फिर भी अपने चाहने वालों के दिलों में रंगीनियां भर गए। मैंने किसी फ़िल्म में तुम्हे 'हीरो' की तरह नहीं देखा। गुरु तुम सुपरस्टार और सुपर-एक्टर के भयंकर कॉम्बो थे। हो। और रहोगे।
यहां कुछ ही फिल्मों का ज़िक्र किया है। मुझे याद है तुमने अपनी एक फ़िल्म में कहा था, कि 'आई थिंक वी फॉरगेट थिंग्स, इफ देयर इज़ नोबडी टू टेल डेम'। लेकिन तुम न यार अपनी इन 'कुछ' फिल्मों के माध्यम से मेरे लिए इतनी व्यवस्था तो कर ही गए हो कि मैं तुम्हें याद रख सकूं।
तुमको याद रखेंगे गुरु.....भगवान कसम। क्योंकि हमारे पास चॉइस ही क्या है....

Sunday, April 26, 2020

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को उड़ा देगी कोरोना की आंधी!

(स्त्रोत:गूगल)
183 बिलियन (अरब) वाली इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री इस वक़्त सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रही है। कहते हैं आंधी जब आती है तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर जाती। लेकिन आंधी से हुए नुकसान का असली पता उसके जाने के बाद चलता है। ठीक ऐसे ही कोरोना महामारी वही आंधी है जिसके जाने बाद ही पता चलेगा कि वह कितना कुछ अपने साथ लेकर गई है।
(स्त्रोत:गूगल)
साल 2020 की शुरुआत तानाहजी, छपाक, स्ट्रीट डांसर 3D, पंगा, मलंग, भूत, शुभ मंगल सावधान जैसी फिल्मों से हुई थी। इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा धमाल नहीं मचाया था जिसके बाद लोग कुछ अच्छी फिल्मों की आस लगाए बैठे थे। बताया जा रहा है, साल की मोस्ट अवेटेड फ़िल्म 'ब्रह्मास्त्र' जिसमें आलिया भट्ट और रणबीर कपूर दिखने वाले हैं भी रुकी हुई है। फ़िल्म की रिलीज़ डेट 4, दिसंबर, 2020 रखी गयी थी। लेकिन कोरोना को देखते हुए यह भी पटरी से उतरती नज़र आ रही है। 1983 में कपिल देव की कप्तानी में भारत द्वारा जीते गए पहले विश्व-कप पर बन रही रणवीर सिंह स्टारर फ़िल्म '83' 10 अप्रैल को रिलीज़ होनी थी। इसकी सूचना 20 मार्च को ही फ़िल्म के निर्माताओं द्वारा दे दी गयी थी। लेकिन लोकडाउन के कारण फिल्म रिलीज़ नहीं हो पायी।

क्या कहते हैं आंकड़े?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पहले ही 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान झेल चुकी है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि बॉक्स ऑफिस पर कमाई 'जीरो/शून्य' है। ट्रेड एनालिस्ट गिरीश जोहर के अनुसार फिल्मों की रिलीज़ डेट 2021 तक खिंचने की गुंजाइश है। फाइनांशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट की माने तो पिछले साल इसी समय 1499.9 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी लेकिन इसबार यह सिर्फ 1062.4 करोड़ तक ही पहुंच पायी है।
(स्त्रोत:गूगल)
बॉलीवुड का गणित: 
बॉलीवुड का गणित कहता है कि फ़िल्म निर्माता जब फिल्में रिलीज़ करते हैं तब इस बात का ध्यान रखते हैं कि वह दिन सही हो। अधिकतर फ़िल्म निर्माताओं की कोशिश रहती है कि त्योहारों पर फिल्मों को रिलीज़ किया जाए। इसबार भी वैसा ही होगा। अनुमान लगाया जा रहा है कि लोकडाउन खुलते ही और कोरोना महामारी के जाते ही फ़िल्म निर्माता त्योहारों की तारिखों को झपटने की कोशिश में रहेंगे। अजय देवगन की फ़िल्म 'भुज: दा प्राइड ऑफ इंडिया' और आमिर खान की फ़िल्म 'लाल सिंह चड्ढा' की रिलीज़ डेट का अनुमान अगस्त में लगाया जा रहा है। ईद पर हर साल सलमान खान अपनी कोई फिल्म रिलीज़ करते हैं। ये ठीक ऐसा है कि सलमान के लिए उनकी ईदी फिल्म द्वारा कमाई गयी कीमत होती होती है। इस साल भी अनुमान लगाया जा रहा था कि सलमान की 'राधे-योर मोस्ट वांटेड भाई' ईद पर रिलीज़ होगी ऐसे ही अक्षय कुमार की फ़िल्म 'पृथ्वीराज' दीवाली पर रिलीज़ होनी थी। लेकिन पेंडेमिक के चलते अब इन दोनों का रिलीज़ होना नामुमकिन लगता है। बॉलीवुड के खिलाड़ी अभिनेता अक्षय कुमार की सिर्यवँशी को भी 24 मार्च को सिनेमाघरों में दस्तक देनी थी लेकिन इसका हाल भी इन सभी फिल्मों जैसा ही हुआ।
तेलगु फ़िल्म पोस्टर (स्त्रोत:गूगल)
दूसरी इंडस्ट्री का क्या हाल है?
बॉलीवुड को छोड़ अगर दूसरी फ़िल्म इंडस्ट्री जैसे तेलगु, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, बंगाली आदि का भी यही हाल है। शायद इससे भी बुरा। इंडियन एक्प्रेस की ही रिपोर्ट में फ़िल्म निर्माता श्रीधर रेड्डी कहते हैं कि तेलगु फ़िल्म इंडस्ट्री ने इसबार गर्मियों में 400 करोड़ रुपये तक की कमाई का अनुमान लगाया था लेकिन अब ये मुश्किल है। 
वहीं एक्टिव फ़िल्म प्रोड्यूसर गिल्ड की प्रोड्यूसर दमू कनूरी कहती हैं कि, 'गर्मियों में 3 बड़ी तेलगु फ़िल्म रिलीज़ होनी थी। अगर इनमें से एक का भी अच्छा रिस्पांस आता तो हम 350 करोड़ रुपये तक की कमाई का अनुमान लगाकर बैठे थे। लेकिन अब कोरोना महामारी के चलते सब कुछ पानी में मिल गया है'।
प्रोड्यूसर एसकेएन कहते हैं कि '1000 सीट वाले थिएटर में हर महीने में 10 लाख का नुकसान लोकडाउन की वजह से झेलना पड़ रहा है। नेटफ्लिक्स/हॉटस्टार/वूट जैसे ओटीटी प्लेटफार्म भी उन्हीं फिल्मों को खरीदना पसन्द करते हैं जो हिट होती हैं। लेकिन फिल्मों के रिलीज़ से पहले यह बताना बेहद मुश्किल है कि कौन-सी फ़िल्म दर्शकों को पसन्द आएगी और कौन-सी नहीं।'

Saturday, April 25, 2020

भारत में कोरोना वायरस के मामलें।


Monday, April 20, 2020

वर्चुअल भीड़ की ये जमात खतरनाक है।

ये 'वर्चुअल' दुनियां वाली भीड़ ज्यादा खतरनाक क्यों है?
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भीड़ कोई भी हो, खतरनाक होती है। ये दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी लोगों की यह भीड़ सही-गलत नहीं देखती। ये भीड़ हर जगह होती है और हम सबके बीच ही रहती है। आपके कॉलेजों में, आपके गली-मोहोल्ले में और हां आपके और हमारे फेसबुक/ ट्विटर/व्हाट्सएप्प पर भी। यकीन मानिए ये फेसबुक/ट्विटर वाली 'वर्चुअल भीड़' ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि ये आपको प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं मारती ना ही ये खून खराबा करती है लेकिन ये आपके मन मस्तिष्क में उपजे किसी भी प्रकार के 'अपने से अलग या दूसरे विचार' को पनपने ही नहीं देती है। ये समझते हैं कि आप इन्हीं का हिस्सा हैं लेकिन जैसे ही आप कुछ अलग विचार रख देते हैं ये आप पर बरस पड़ती है। ये महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारावाले लोगों का समूह होता है जो हर दिन, हर वक्त एक्टिव रहती है। इनका काम आदर्शवाद बघारना है और फिर घटिया से घटिया उपयोगितावादी की तरह व्यवहार करना है। अपने आपको आदर्शवादी और त्यागी घोषित करने का ये ट्रेंड खतरनाक है।

उस प्रत्यक्ष लोगों वाली भीड़ का इस्तेमाल तो नेपोलियन, हिटलर ने किया ही था लेकिन इस वर्चुअल भीड़ का इस्तेमाल ये आज की इंफ्लुएंसर बनी और कुछ कथित बुद्धिजीवियो की जमात कर रही होती है। यह वर्चुअल भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो केवल और केवल समाज में उन्माद और तनाव पैदा करने के लिए होती है। फिर ये भीड़ आपको अपने साथ लेकर विध्वंसक काम करवाती हैं जैसा कि अब हो रहा है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है। खैर, अभी भी करवाया जा रहा है।

लेकिन हम आने वाली पीढ़ियों को समझना होगा कि हमारे और आपके आस पास मौजूद ये वर्चुअल दुनिया वाली भीड़ केवल आपको दलदल में फंसाने का काम कर रही हैं, दुनिया में जो क्रांतियाँ हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है।

मैं मानती हूँ कि इन्हें अपना लेना आसान होता है। इनकी हां में हां कर देना बेशक आसान है। मगर दोस्त जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले क्योंकि वह आपकी सुविधा में है और उसमें सुख है तो वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। ना तुम, ना मैं और ना कोई और ये परिवर्तन कर पायेगा।
दोस्त, मत बनने दीजिये खुद को इनका हथियार। मत बनिये इनकी कठपुतली।

#virtualcrowd #virtualhatred

Sunday, April 19, 2020

'असुर'- अंत ही आरंभ है।

"बचपन में हम सभी ने भगवान और शैतान की कई कहानियां अपनी दादी-नानी से तो सुनी ही हैं। अगर अच्छाई के रास्ते चलेंगे तो भगवान मिलते हैं और बुराई के रास्ते चलेंगे तो शैतान का मिलना तय है। लेकिन अगर असल में हम सोचें तो अच्छाई और बुराई दोनों ही हम सभी के अंदर बैठी होती है। बस कब किसको बाहर निकालना है ये हम तय करते हैं।"

आपको 2014 में सनमजीत सिंह तलवर के निर्देशन में आयी फ़िल्म ढिश्कियाऊं याद है? ऑनी सेन के निर्देशन में बनी Voot पर आयी 'असुर' वेब सीरीज आपको उसकी याद दिला सकती है। हालांकि वेब सीरीज के लेखक गौरव शुक्ला ने इसे लिखा बेहद अलग ढंग से है और इसकी एंडिंग भी अलग है लेकिन फिर भी कहानी आपको उस फ़िल्म की याद जरूर दिलवाएगी। सीरीज़ खत्म होने पर आपको ऐसे लगेगा जैसे ये आप पहले ही किसी फ़िल्म में देख चुके हैं। ये कहानी आपको डार्क नाइट के जोकर की भी जरूर याद दिलाएगी।  
Voot पर रिलीज़ हुई हिंदी वेब-सीरिज़ 'असुर- वेलकम टू योर डार्क साइड' एक मायथोलॉजी सस्पेंस थ्रिलर है। ये सीरिज़ कली-कल्कि अवतार वाली कहानी, देव-असुर की कहानियां जो शायद आपने अपनी दादी या नानी से ही कभी सुनी होगी ऐसे स्टोरीज़ को दोबारा से याद दिलवाती हैं। इसमें अरशद वारसी और अधिकतर इंडियन सिरियल में ही दिखने वाले बरुन सोबती मुख्य किरदार में हैं

क्या है वेद-पुराण वाला कनेक्शन?
श्रीमद्भागवत-महापुराण के 12वें स्कंद के में श्लोक लिखा है-
सम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।
भवने विष्णुयशसः कल्कि: प्रादुर्भविष्यति।।
अर्थात: शम्भल ग्राम में विष्णुयश नाम के एक ब्राह्मण होंगे। उनका ह्रदय बड़ा उदार और भगवतभक्ति पूर्ण होगा। उन्हीं के घर कल्कि भगवान अवतार ग्रहण करेंगे।
कुछ ऐसा माना जाता है कल्कि का रूप।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के दसवें अवतार 'कल्कि' का अवतरण कलयुग के अंत में होना है। श्रीमद्भागवत गीता में भी कहा गया है कि "जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ। सज्जनों और साधुओं की रक्षा के लिए, दुर्जनो और पापियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूँ"
बस ये कहानी बार-बार आपको इन्हीं दो श्लोकों की याद दिलवाती रहेगी।

कहानी क्या है?
कहानी 'शुभ' नाम के एक ऐसे एक्स्ट्रा-आर्डिनरी बच्चें के बारे में है जो गलत नक्षत्र में पैदा हो जाता है (उसके पिता के अनुसार)। इसी कारण वह उसे बचपन से ही 'असुर' कहने लगता है। ये बात उसके दिमाग में बैठ जाती है और वो खुद को मायथोलॉजीकल केरैक्टर 'कली' मानने लगता है। वह बड़े होकर दूसरों को मारना शुरू कर देता है इस आस में कि विष्णु का अवतार कल्कि तक उसका सन्देश जाए। सीबीआई को जैसे ही इसकी भनक लगती है वो इसकी तहक़ीक़ात शुरू कर देते हैं। 10 साल पहले सीबीआई छोड़ चुके विदेश में रह रहे निखिल नायर के फ़ोन में मरे हुए इंसानों के कोऑर्डिनेट आने लगते हैं (निखिल नायर किसी ज़माने में डीजे के साथ काम कर चुका होता है और आपसी कलह की वजह से सीबीआई छोड़कर चला जाता है)। वह इसकी जानकारी अपने पुरानी कलीग लोलार्क दुबे को देता है। धनंजय राजपूत 'डीजे' का किरदार निभा रहे अरशद सीबीआई में सीनियर होते हैं और ये इन केस को हैंडल करने का जिम्मा उन्हें दिया जाता है। कुछ दिन बाद जाकर पता चलता है कि इन लोगों को मारने वाला प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर इन दोनों से (निखिल और डीजे) जुड़ा होता है। बाद में जाकर निखिल को किन्ही कारणों से विलेन का साथ देना पड़ता है और वो उसके साथ मिलकर लोगों को मारना शुरू कर देता है। कहानी में ऐसे ही चूहे बिल्ली जैसा खेल चलता रहता है। अब ये पूरी कहानी तो खैर आपको सीरीज़ देखने पर ही समझ आएगी।

कहानी कहाँ कहाँ निराश करती है?
1. कहानी में एक साथ बहुत घोच-पोच हो रहा होता है जिसे समझने में काफी दिक्कत होती है। क्योंकि कहानी में सब चीज़े बहुत इंस्टेंट हैं तो इसमें नज़रें हटी, दुर्घटना घटी जैसा सीन है। अगर आप एक भी सीन मिस करते हैं तो हो सकता है आपको अगला सीन समझने में दिक्कत हो।
2. कहानी में फीमेल रोल बहुत कम दिखाया गया है। हालांकि लीड की पत्नी नैना का किरदार निभा रही अनुप्रिया गोइन्का का सीरीज के आखिरी 2 एपिसोड में फायरवॉल सिक्योरिटी तोड़ने और फिर असुर को ट्रैक करने वाला रोल दिखाया गया है बावजूद इसके उसका स्क्रीनटाइम बेहद कम है। इसका दूसरा किरदार है नुसरत सईद का। रिद्धि डोगरा यह किरदार निभा रही है। नुसरत सीबीआई में ही काम करती है। फॉरेंसिक डिपार्टमेंट को सम्भाल रही सीनियर पोस्ट पर है, बाद में जाकर प्रमोशन भी होता है लेकिन फिर भी एक दिल टूटा आशिक़ ही नज़र आती है। एक और किरदार भी है आयुषी मेहता खैर वो तो बस नाम के लिए ही नज़र आ रही हैं।
3. कहानी में ये दिखाने की पूरी कोशिश की है कि शुभ मायथोलॉजी को असली मानकर खुद को असुर 'कली' मानता है और कलगी अवतार/ विष्णु तक अपना सन्देश पहुँचाना चाहता है और इसीलिए वह लोगों की हत्या कर रहा है। लेकिन कहानी के कुछ पार्ट में कहीं-कहीं दूसरा या तीसरा लॉजिक भी दिखाया जाता है जिसमें शुभ बदला लेना चाहता है। या शायद जबरदस्ती कहानी को खींचने की कोशिश की गयी है। 
निखिल नायर और दिग्विजय राजपूत।
कहानी की एंडिंग का भंड़ाफोड़ करें? 
कहानी के आखिर में दिखाया गया है कि सीबीआई में काम करने वाला रसूल ही 'शुभ' है। लेकिन बनारस के जेल में जब आग लग जाती है तब चार लोग मरते हैं (शुभ को जोड़कर)। उसमें से तीन लोग (काली आंखों वाला लड़का, रसूल और केसर) आ चुके हैं। अभी तक भी चौथा इंसान नहीं दिखाया गया है। उसकी एंट्री अभी बाकी है जो हो सकता है असली 'शुभ' हो। तो मेरे खयाल से असली शुभ की पहले सीज़न में एंट्री नहीं हुई है। ये तीनों बस फॉलोवर्स भर हैं। इसका एक और कारण भी है कि जब रसूल लोलार्क को उस जगह लेकर जाता है जहां निखिल नायर को रखा गया था वहां डायरी में से एक बचपन की घटना पढ़ते हुए वो बचपन में की चीटिंग का जिक्र करता है जिसमें उसकी मैडम उसे फेल कर देती है। टेक्निकली शुभ एक एक्स्ट्रा-आर्डिनरी बच्चा होता है। उसे चीटिंग की क्या जरूरत? 
अंत ही आरंभ है।
मुझे लगता है अच्छे या बुरे इंसान जैसा कोई कांसेप्ट ही नहीं है। हमारे हालात तय करते हैं कि हम अच्छे हैं या बुरे। चलिए उदाहरण के तौर पर ही देखिए....आपके घर में आ कर चोरी करने वाला इंसान आपके लिए 'बुरा इंसान' हो सकता है... लेकिन अगर उस इंसान के परिवार की साइड से देखें तो उनका पेट भरने वाला वो इंसान एक 'अच्छा इंसान' है। 
खैर...काफी अच्छी वेब-सीरिज़ है। आपके दिमाग के घोड़े दौडवाने का दम रखती है। देख डालिये। अगर आप 'मैं हिंदी वेब-सीरिज़ नहीं देखती/देखता' वाले हैं तब भी ये आपको निराश नहीं करेगी पक्की बात है। या अगर आप 'ब्रो! सेक्रेड गेम्स जैसी फाड़ वेब-सीरीज़ नहीं बन सकती इंडिया में' वाले हैं तब तो ब्रो पक्का देख ही डालिये। 
पहला सीज़न देखकर ही अगर आप सोच रहे हैं कि आप कहानी समझ गए हैं तो बस यही कहना चाहूंगी कि ए-दिले नादान 'शुभ' का आना बाकी है क्योंकि 'अंत ही आरम्भ है'।

Sunday, March 29, 2020

Lockdown Days: 1

पुरानी यादों में ठंडी आहे भरने से बेहतर यह होता है कि चुनौतियों और समस्याओं को नए परिपेक्ष्य में देखा जाए, उनसे निपटने के नए तरीके अपनाए जाए। 
देशभर में हो रहे पलायन के लिए सरकार ज़िम्मेदार है पूरी तरह से। अपने घरों की तरफ बढ़ते इन आम मजदूरों को चाहे जितना गरिया सकते हैं आप। लेकिन यकीन मानिये सब मजबूर हैं। हम, आप, ये पलायन करते लोग और सरकार भी। किसी भी आपदा से निपटने के लिए हम तीन स्टेप फॉलो करते हैं। आपदा से पहले लिए जाने वाले measures, आपदा के समय और आपदा के बाद। लेकिन खांका तो हम पहले ही बनाते हैं ना। हम चीन और अन्य देशों को देख चुके थे। वहां मचे हाहाकार से हम परिचित थे। हम समझ चुके थे की ये बीमारी तबाही लाएगी। जरूर लाएगी। पैनिक क्रिएट होगा। जहां आधे से ज्यादा आबादी अपने होम स्टेट को छोड़कर दूसरे स्टेट में काम करती है वहां लोकडाउन के बाद पैनिक क्रिएट होना था। इसके लिए हमें पहले से शायद तैयार रहना चाहिए था। हम नहीं थे। एक छोटा सा गलत स्टेप ना जाने कितनों की जान ले सकता है। सरकार अपना काम करे और जितनी तेज़ी से दूसरे स्टेप्स लिए गए हैं उतने ही तेज़ी से इनके लिए भी लिए जाने चाहिए। ये सही सलामत घर पहुँचे और इनके जाने के बाद सभी मेडिकल केयर और अन्य चीज़े ध्यान में रखी जाएं। आप भी समझिए...कोई बदलाव थोड़ी खुशी के साथ ढेर सारी समस्याएं लेकर आते हैं। लेकिन वो अपरिहार्य होते हैं। मैं फिर कहती हूँ ये राजनीति नहीं है। आरोप प्रत्यारोपों से बचिए। आप से जो मदद हो पाए कीजिये लेकिन अपना ध्यान रखिये। भावों में मत बहिये। सारे प्रीकॉशन्स लीजिये। सब खुद को भी बचा लेंगे ना तब भी आपका बहुत बड़ा योगदान होगा इस बीमारी से बचाने में।
देखिए ना, वक्त का तकाज़ा ही है कि आज हम हाथ धोना सीख रहे हैं, छोटे-छोटे बच्चे घर के बड़े-बूढ़ों को हाथ धोना सिखा रहे हैं। 
हम जल्द ही इस बीमारी से निकलेंगे। गली के बच्चें अपनी छतों पर खड़े होकर फिर से एयरोप्लेन के आने पर तालियां बजायेंगे। लेकिन आज उड़ना मना है। शो मस्ट गो ऑन के कांसेप्ट को थोड़ा सा आराम दीजिये। आराम करिए। घरों में रहिये। ख्याल रखिये। 

#Corona #Lockdown_day

Friday, March 27, 2020

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान छोड़ देंगे खेती?

महंगाई डायन खाई जात है.....
बुआई करता गन्ना किसान।
मुज़फ्फरनगर जनपद के खेड़ा गांव में रहने वाले 46 वर्षीय राहुल कहते हैं कि 'इस बार नवंबर में मिल शुरू हुआ था और अभी तक चल रहा है। जिसमें अभी तक केवल 12 दिन का ही भुगतान किया गया है। मेरा 75 फीसदी गन्ना चला गया है जिसमें से केवल 15 प्रतिशत का ही भुगतान किया गया है। जो 15 प्रतिशत गन्ना अब बचा है न जाने कब जाएगा। गर्मी की वजह से जो गन्ना 80 निकलता है वो अब 50 निकलेगा। बुआई में भी देरी होगी। किसान की किस्मत में मरना ही लिखा है। कोई भी सरकार आये किसान हमेशा घाटे में ही रहा है।'
उत्तर प्रदेश की सबसे बड़े गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में गिनती होती है लेकिन यहां स्थिति और खराब है। शुगर मिल्स एसोसिएशन के अनुसार 2 सितम्बर 2019 तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर 6480 करोड़ रुपये बकाया था। जबकि योगी सरकार ने यह वादा भी किया था कि प्रदेश के गन्ना किसानों को भुगतान हर हाल में 14 दिनों के अंदर-अंदर कर दिया जायेगा और नहीं करने पर ब्याज के साथ मूल राशि दी जाएगी। 
अपने खेत मे बुआई करते सोमपाल।
भसाना मिल में अपना गन्ना देने वाले सोमपाल बताते हैं कि 'अभी तक केवल 12 दिन का ही पेमेंट आया है। नवम्बर 2019 में उन्होंने अपना गन्ना देना शुरू किया था। जिसके बाद फरवरी तक वो लगभग 300 क्विंटल गन्ना दे चुके हैं। जनवरी में भी गन्ने का भुगतान किया गया था लेकिन वो भुगतान पिछले साल का था। यानी लगभग 9 महीने बाद भुगतान किया गया था। हम रातभर मिल में खड़े रहते हैं। 11 बजे घर से निकलते हैं और सुबह 4 बजे घर आते हैं। खेती करना घाटे का सौदा है।'
साथ में खड़े भसाना मिल में ही अपना गन्ना देने वाले जयदेव भी कहते हैं कि 'किसानों को 10-10 घण्टे का भी इंतज़ार करने पड़ता है सहकारी मिलों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी प्राइवेट मिलों का यही हाल है'। 
भसाना मिल की पर्ची।
भसाना मिल बजाज हिंदुस्तान का मिल है। 2018-2019 में 94 निजी, 24 सहकारी और उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम की एक इकाई समेत 119 राज्य मिलों ने पेराई परिचालन में भाग लिया था। इन 94 निजी मिलों में से 31 मिल बजाज हिंदुस्तान शुगर लिमिटेड के अंतर्गत आते हैं। बिज़नेस स्टैण्डर्ड के अनुसार सितम्बर 2019 में बजाज हिंदुस्तान पर 5,580 करोड़ रुपये बकाया थे जिसके कारण उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस केस दर्ज करवाया था। यूपी के टॉप प्रोड्यूसर मिलों में मवाना शुगर लिमिटेड, बजाज हिंदुस्तान शुगर लिमिटेड, मोदी शुगर मिल, वेव इंडस्ट्रीज और यादव शुगर लिमिटेड आते हैं। 

मिलों पर किसानों का बकाया पैसा:
25 जून 2019 की बात की जाए तो गन्ना किसानों के 18143 करोड़ रुपये बकाया थे वहीं पर केवल उत्तर प्रदेश किसानों की अगर बात की जाए तो यह राशि 10134 करोड़ थी, 2018-19 में 17,840 करोड़ रुपये और 2017-18 में यह बकाया मूल्य 303 करोड़ रुपये था। 
उत्तर प्रदेश शुगर मिल एसोसिएशन के अनुसार एक अक्टूबर से 20 फरवरी 2020 तक राज्य की चीनी मिलों पर किसानों का बकाया बढ़कर 7,392.47 करोड़ रुपए पहुंच गया है ।जबकि पेराई सीजन 2018-19 का 515.55 करोड़ रुपए बकाया है, 2017-18 का 40.45 करोड़ रुपए और 2016-17 का भी 22.29 करोड़ रुपए चीनी मिलों पर अभी तक बकाया है। 
यूपी केन की वेबसाइट (UPCANE) के अनुसार पेराई सत्र 2019-2020 में 19 मार्च 2020 तक 13,725 करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका है। वहीं पर पेराई सत्र 2018-2019 में कुल देय गन्ना मूल्य 33,048 करोड़ रुपये के सापेक्ष 32,798 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है।
यूपी केन कि वेबसाइट के ही अनुसार 2011 से लेकर 2019 तक हर साल मिल नवंबर में शुरू होकर मार्च तक चली है जिसमें हर बार किसानों का भुगतान 8-9 महीने के अंतराल पर ही किया गया।

इस साल के बजट में कहां है किसान? 
उत्तर प्रदेश के आज तक के सबसे बड़े बजट में इस साल कृषक कल्याण के तहत 36,000 करोड़ से 86 लाख लघु एवं सीमांत किसानों का फसल ऋण मोचन किया गया। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में प्रदेश के सभी किसान आच्छादित, 2 करोड़ 4 लाख किसानों के खाते में 12 हज़ार करोड़ रुपये हस्तांतरित, 4 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं 1.11 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड वितरित की बात कही गयी है। सरकारी आंकड़ों की ही माने तो सूचना एवं जनसंचार विभाग, उत्तर प्रदेश के अनुसार पिछले 3 सालों में किसानों का 92,522 करोड़ रुपयों का गन्ना मूल्य भुगतान हो चुका है।
सरकार ने 2016 में किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने की बात भी कही थी। लेकिन मूल धन तो मिल नहीं पा रहा है फिर दोगुनी आय का सवाल ही कहाँ से आया? इसबार हालांकि कृषि क्षेत्र के लिए 283 लाख करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं।

मौसम की मार और किसान: 
इस साल बारिश की वजह से कोल्हू बन्द हुए हैं। जिससे गन्ना मंदा हो गया है और गुड़ महंगा। अभी गन्ने का रेट 325 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है। मायावती सरकार के दौरान ही 40 रुपये प्रति वर्ष यह बढ़ाया जाता था लेकिन उसके बाद आने वाली सभी सरकारों ने गन्ना किसानों के लिए कोई खास सुविधा नहीं की।
कोल्हू।
वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश आर्येन्दू लिखते हैं कि 'सरकारी नौकरी पेशा वाले लोगों के वेतन में 120-150 गुने की वृद्धि हुई है जबकि किसानों की मुश्किल से 19 प्रतिशत। सरकारी कर्मचारियों को स्वास्थ्य भत्ता चार लाख अस्सी हज़ार मिलता है, सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों, जजों, कर्मचारियों को इक्कीस हज़ार अतिरिक्त भत्ता मिलता है। लेकिन किसानों के लिए न कोई भत्ता है न कोई योजना।'
किसान नेताओं के बारे में बताते हुए रामभूल कहते हैं कि 'हम 40 साल से खेती कर रहे हैं हमे कभी कोई फायदा नहीं मिला। लोग किसान नेता बने बैठे हैं, 4 दिन धरने पर बैठते हैं फिर सुलह हो जाने पर उठ जाते हैं। सब अपनी जेब भरना चाहते हैं। गरीब किसान का तो नुकसान होना ही है चाहे कुछ भी करें'।
62 वर्षीय बीरसिंह नहीं चाहते उनके बच्चें या पोते खेती करें। वो कहते हैं कि 'मेरी पूरी ज़िंदगी खेती करने में बीत गई। किसान को मरना ही है, इससे अच्छा है कि 10-12 हज़ार की नौकरी कर लें कम से कम पैसे तो समय से मिलते हैं। 1 बीघा खेत में 5000-6000 तक का खर्च आता है। मिल पेमेंट नहीं करता तो हमे लोन लेना पड़ता है और फिर न चुकाने पर बैंक वाले भी हमे डंडा करते हैं। महंगाई इतनी है। अब अगर लोन नहीं लेंगे और अगले सत्र की बुआई कैसे करेंगे? हम खाएंगे क्या?'
62 वर्षीय बीरसिंह।
किस सरकार ने कितना फायदा दिया?
राजनीतिक महत्व की अगर बात की जाए तो लोकसभा की 545 सीटों में से लगभग 164 सीटों पर गन्ना किसानों का सीधा असर पड़ता है। प्रदेश के 44 जिलों में गन्ना उत्पादन होता है और 28 जिलों की तो पहचान ही गन्ना किसानों के तौर पर होती है। वित्त मंत्री के द्वारा पेश किये गए बजट के अनुसार यह बजट इन करोड़ों भारतीय किसानों की आकांक्षा पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित करता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी है। 
2000 से 2002 के बीच में भाजपा ने दो बार गन्ने का समर्थन मूल्य 5 रुपए बढ़ाया था। वहीं पर सपा सरकार ने 2004 से 2007 के बीच 13 से 10 रुपए तक का इजाफा किया था और बसपा ने 2008 से 2011 के बीच इसमें 10 से 35 रुपए तक की बढ़ोतरी की थी। सपा सरकार दोबारा जब 2012 में आई तो उसने गन्ना समर्थन मूल्य में 40 रुपए की बढ़ोतरी की। 2017 में चुनाव से ठीक पहले सपा सरकार ने 25 रुपए एकबार फिर बढ़ाए। फिर इसके बाद योगी सरकार ने 10 रुपए का इजाफा किया। हालांकि, हर साल बढ़ती महंगाई के चलते किसानों को बढ़ी हुई दर खाद, बीज, सिंचाई और लेबर चार्ज आदि के हिसाब से कम ही रहती है।
कांटे पर गन्ना तोलवाते किसान।
नेशनल स्कीम पालिसी कहती है कि कृषि से देश की अर्थव्यवस्था को कोई खास फायदा नहीं हो रहा है। इसलिए उन क्षेत्रों को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिनसे अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिले। लेकिन यहां सरकार को समझना होगा कि मुद्दा ये नहीं है कि फायदे का सौदा क्या है बल्कि परेशानी ये है कि किसानों पर कुदरत भी कहर ढाती रहती है। राहत देकर कबतक मरहम लगाया जाएगा? आज़ादी के बाद से कोई भी ऐसी सरकार नही आयी जिसने सरल और निश्चित आय बनाने के सन्दर्भ में काम किया हो। घाटे वाली कृषि का सबसे बड़ा कारण उनसे जुड़ी सरकारी योजनाएं ही होती हैं। जरूरी है आला अधिकारी अपने निजी हितों को छोड़कर इन छोटे-बड़े किसानों के बारे में सोचे। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब ये सभी किसान खेती छोड़ अन्य नौकरियों की तरफ रुख करेंगें।

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